परिचय : जामिया उम्मेहातुल मुअमिनीन लिल बनात

पानीपत (हरयाणा) हिंदुस्तान का एक ऐतिहासिक शहर है. इस इलाक़े में बहुत दिनों से मुस्लिम लड़कियों के लिए एक ऐसे स्कूल या मदरसे की ज़रुरत महसूस की जा रही थी जिस में मुस्लिम क़ौम की बच्चियों को दीनी तालीम के साथ साथ मॉडर्न एजुकेशन की भी अच्छी से अच्छी पढ़ाई कराई जा सके. एक तरफ अगर वो दीनी इल्म, दीनी मिजाज़, दीनी जज़्बे से सरशार हों तो दूसरी तरफ वो साइंस व टेक्नोलॉजी में भी आगे निकल सकें जो की वक़्त की एक अहम ज़रुरत है ताकि एक सलीक़ा मंद और दीनदार औरत का किरदार अदा कर सकें. क्योंकि माँ की गोद बच्चे का पहला मदरसा, मकतब और तरबियत गाह होती है. अगर माँ तालीम याफ्ता, सलीक़े मंद, बा किरदार और अच्छे अख़लाक़ वाली होगी तो यकीनन इनकी गोद में पलने वाले बच्चे भी पक्के सच्चे मुसलमान होंगे.
इन्ही मक़सद के तहत हज़रात अल्हाज मौलाना असदुल्लाह साहब नाज़िम जामिया उम्मेहातुल मुअमिनीन लिल बनात सनार गॉव, अमेठी के तआवुन और होंसला अफ़ज़ाई की बदौलत जनाब मौलाना अमजद मजीदी साहब क़ासमी ने मुस्लिम बच्चियों की तालीम का बीड़ा उठाया और उलेमा दीन, दानिश वरान मिल्लत ख़ास तौर पर जानशीन शेखुल इस्लाम हज़रात मौलाना सैयद अरशद मदनी साहब (सदर जमीअत उलमा ए हिन्द) व हज़रात मौलाना नूरुल हसन रशीद साहब कांधलवी वगैरह से सलाह व मशवरे के बाद हज़रात अल्हाज हकीम अब्दुल मजीद साहब रहमतुल्लाह अलैहि पत्थरगढ़ी की याद में एक दीनी इदारा बनाम "जामिया उम्मेहातुल मुअमिनीन लिल बनात" का आग़ाज़ किया. जो अल्हम्दुलिल्लाह तरक़्क़ी की राह पर गामज़न है. इस साल जामिया में कुल २२५ लड़कियां ज़ेरे तालीम हैं जिनमे से १५५ लड़कियां आस पास के इलाक़े की हैं और ७० लड़कियां जामिया के हॉस्टल में रहती हैं जिनके रहने खाने का पूरा इंतज़ाम जामिया की तरफ से है. जामिया में क़ुरआन करीम हिफ़्ज़, नाज़राह, दीनियात और मुकम्मल आलमियत के कोर्स के साथ साथ लड़कियों को हरयाणा बोर्ड से १२ क्लास पास कराने का भी इंतज़ाम है .

लड़कियों की तालीम और उस की अहमियत व फायदे

औरतें किसी भी क़ौम में बुनयादी किरदार अदा करती हैं. औरतों की दुरुस्तगी पूरी क़ौम की दुरुस्तगी के लिए बुनयादी शर्त की हैसियत रखती है. इसलिए इस्लाम ने औरतों की इस्लाह और तामीर किरदार पर पूरी अहमियत के साथ तवज्जोह दी है क्योंकि माँ की गोद बच्चे की सबसे पहली दरसगाह भी है और तरबियतगाह भी और यह ऐसी असरदार दरसगाह है की यहाँ का सीखा हुआ सबक दिल व दिमाग पर पत्थर के नक़्श से भी ज़्यादा असरदार होता है. आने वाली क़ौम की तरक़्क़ी की ज़मानत सिर्फ इसी सूरत में दी जा सकती है जबकि इंसानो की तामीर बेहतरीन बुन्याद पर करने वाले हों. माँ अगर इस्लामी सीरत और तालीम वाली होगी तो बच्चे को भी इस्लामी अहकाम और अदब सिखाएगी .
इसलिए मिल्लत ए मुस्लिम के लिए जितनी अहमियत मर्दों की दीनी इस्लाम को हासिल है, औरतों की दीनी तालीम व तरबियत उस से किसी तरह कम अहमियत नहीं रखती. सरकार दो आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का मामूल था की आप के अक्सर खिताब में मर्द और औरत दोनों ही मुखातिब होते थे लेकिन कभी कभी आप ख़ास तौर से औरतों को खिताब करने के लिए मजलिसें क़ायम फ़रमाया करते थे ता की इन के ज़रिये औरतों की तरबियत खुसूसी अहमियात के साथ हो सके .
इस्लाम के शुरूआती दौर से ही औरतों ने दीन को फ़ैलाने और दीन का प्रचार करने के लिए बड़ी बड़ी क़ुर्बानियां दी हैं. इतिहास गवाह है कि सबसे पहले दीन इस्लाम क़ुबूल करने वाली शख्सियत औरत ही कि ज़ात थी (यानी हज़रत खदीजा रज़ि०) और सबसे पहले जिसने सबसे पहले इस्लाम क़ुबूल करने कि सज़ा में जाम ए शहादत पिया था वह भी औरत ही थी (यानी हज़रत अम्मार रज़ि० कि वालिदा मोहतरमा हज़रत सुमय्या रज़ि०) अबू जहल बदबख्त के नेज़ा मारने से हज़रत सुमय्या रज़ि० शहीद हुयी थी. इससे पहले इस्लाम में कोई भी मर्द या औरत शहीद नहीं हुआ था. यह भी मशहूर वाक़िया है कि हज़रत उमर रज़ि० के इस्लाम क़बूल करने का जरिया भी इनकी बहन हज़रत फातिमा बिन अलखिताब रज़ि० बनी थी और यह भी इस्लामी इतिहास में मौजूद है कि जब हिजरत का सिलसिला शुरू हुआ तो अपने दीन व ईमान कि हिफाज़त के लिए मर्दों के साथ औरतों ने भी हिजरत कि थी. फिर इन पाकीज़ा औरतों ने जिहाद में भी हिस्सा लिया और दीन इस्लाम को सरबुलन्द किया. लेकिन मौजूदा दौर में औरतें इस्लामी सीरत और तालीम से दूर होती जा रही हैं और इस्लाम से निस्बत व तालुक कम होता जा रहा है जिस कि अहम वजह इस्लामी अक़ाइद और सीरत व तालीम से दूरी है

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